चुनावों की तारीख का ऐलान तो अभी कुछ ही दिनों पहले हुआ है लेकिन रेवड़ियों की बरसात काफी समय से जारी है। इतिहास बताता है कि साढ़े चार साल के कार्यकाल में किये विकास कार्यों और योजनाओं पर अंतिम छह महीने में की गयी घोषणाएं भारी पड़ती हैं। राजनीतिक दल बखूबी जान चुके हैं कि आम वोटर भुलक्कड़ होते हैं, ज्यादा पहले से किये विकास कार्य, जनहितैषी योजनाएं और घोषणाएं भूल जायेंगे इसलिए चुनाव की घोषणा के एकदम पहले रेवड़ियां बांटना ज्यादा फायदे का सौदा होता है।
ऐसा नहीं है कि इस प्रकार की रेवड़ियां मौजूदा सरकार ने बांटी है बल्कि ऐसी रेवड़ियां बांटने का इतिहास काफी लम्बा रहा है। पूर्ववर्ती सरकारों ने भी जमकर खजाने के द्वार खोले हैं लेकिन हमेशा ही चुनावों से ठीक पहले। और ऐसा भी कतई नहीं है कि रेवड़ियां बांटने के अधिकार सिर्फ सरकार के पक्ष को है, विपक्ष भी रसगुल्ले खिलाने के ख्वाब दिखाता है लेकिन सिर्फ चुनाव से पहले। पक्ष और विपक्ष दोनों को ही लगता है कि उसके प्रलोभन में ज्यादा दम है और वोटर को बहकाने में वही कामयाब हो जायेंगे।
साल 2004 में वाजपेयी सरकार के पास गिनवाने के लिए सार्थक मुद्दों का स्पष्ट अभाव था इसलिए वह “इंडिया शाइनिंग” और “फील गुड फैक्टर” के भरोसे चुनाव मैदान में उतरी और महज 138 सीटें जीतकर दूसरे स्थान पर रही जबकि साल 1996 के बाद से सत्ता से दूर रही कांग्रेस मात्र 145 सीटें जीतकर खंडित जनादेश के बावजूद गठजोड़ वाली सरकार बनाने में कामयाब रही। कांग्रेस की इस जीत में जितना योगदान वादों और आश्वासनों का रहा उससे कहीं ज्यादा योगदान रहा भाजपा के अतिआत्मविश्वास, अतिउत्साह और बेहद अक्षम चुनावी रणनीति का। भाजपा का मानना था कि उसकी जनहितैषी योजनाएं उसे वोट दिलवाएंगी जबकि हकीकत यह थी कि उनकी योजनाएं इतनी दूरगामी थी पांच साल में कोई ठोस परिणाम न दिखा पायीं। इसके उलट साल 2009 में कांग्रेस 145 के मुकाबले 206 सीटें जीती और जैसे तैसे सत्ता के द्वार पर पहुँच गयी। इस आम चुनाव में भाजपा के पास न तो वाजपेयी सरकार की गठबंधन वाली मजबूर सरकार की उपलब्धियां थी और न ही मनमोहन सरकार के खिलाफ कोई ठोस मुद्दा और न ही कोई लोकलुभावन वादे, कुल मिलाकर रसगुल्लों की अनुपस्थिति रही। जबकि कांग्रेस के पास था मनरेगा, कामनवेल्थ के चलते विकसित हो रहा इंफ्रास्ट्रक्चर, राइट टू इनफार्मेशन नाम के मुद्दे और साथ ही मुफ्त अनाज़, खाद्य सुरक्षा बिल, ज्यादा प्रभावी मनरेगा जैसी रेवड़ियां। फिर आया साल 2014 और साथ ही आया मनमोहन सरकार के दौरान हुए घोटालों के उजागर होने का दौर, तभी वक़्ती नब्ज़ को देखते हुए भाजपा ने मैदान में उतारा तीन बार के मुख्यमंत्री और शब्दों के बाज़ीगर नरेंद्र मोदी को। नरेंद्र मोदी ने न केवल मनमोहन सरकार के एक बाद एक खुलते जा रहे भ्रस्टाचार के मुद्दों को भुनाया बल्कि जनता में रसगुल्ले रूपी ऐसे सपने दिखाए कि लगा कि नरेंद्र मोदी ही इस देश की एकमात्र उम्मीद हैं। भ्रष्टाचार उन्मूलन और काले धन के वापसी के साथ ही बेरोजगारी मुख्य निर्णायक मुद्दे रहे। हालांकि चुनाव परिणाम ने यह बात सिद्ध भी कर दिखाई जब भारतीय लोकतंत्र तीस साल बाद पूर्ण बहुमत वाली सरकार का गवाह बना। कहने का मतलब स्पष्ट है कि चुनाव सरकार की उपलब्धियों और विपक्ष के वादों के बीच की जंग है। सिंहासन उसी को मिलता है जिसकी रेवड़ी या रसगुल्लों में मिठास ज्यादा हो।
बीते ज़माने की बातों को भुलाकर चलिए मौजूदा चुनाव की बात करते हैं। साल 2014 में सत्ताधारी दल ने चुनावी वादे रुपी रसगुल्ला दिखाया था आयकर की सीमा को बढ़ाने का, क्या हुआ और कब, जनाब साल 2019 के चुनाव से ठीक पहले। साढ़े चार साल तक इस विषय पर मौन रहने वाले वित्तमंत्री ने हाल ही में पेश किये गए अंतरिम बजट में यह घोषणा कर दी, शायद यह सोचकर कि इनकम टैक्स रिटर्न भरने के आसपास चुनाव होंगे तो कोई समझदार वोटर कैसे भूल पायेगा कि अगले वित्त वर्ष में टैक्स की मार कुछ कम पड़ेगी। कुछ ऐसी ही सोच रही होगी जब विपक्ष ने हाल ही में “न्याय” नाम की योजना का रसगुल्ला दिखाया। वह विपक्ष जो कि मुख्य विपक्षी दल भी नहीं बन सका था पिछले आम चुनावों में, अपने दशकों पुराने अनुभव की चाशनी में डूबा रसगुल्ला दिखा कर लुभाने का प्रयास किया। विपक्ष को घोषणा करने की ऐसी जल्दी कि लाभ हानि का विचार किये बिना प्रेस कांफ्रेंस कर डाली। विपक्षी दल ने बताया कि सबसे गरीब बीस प्रतिशत ऐसे परिवार जिनकी मासिक आय बारह हज़ार रुपयों से जितनी कम होगी उतना ही सरकारी अनुदान मिलेगा, अगर उनका दल सत्ता में आया तो। ऐसी योजना की घोषणा दो सूरतों में ही की जा सकती है, पहली कि यह सिर्फ चुनावी वादा होगा जो कभी पूरी करना ही नहीं है और दूसरी यह कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र पर राज करना है तो आम जनता को नाकारा बनाकर रखा जाये। जब योजना ऐसी हो कि जो जितना कम कमायेगा उतना ही अधिक सरकारी अनुदान पायेगा तो कोई काम भला क्यों करेगा? दोनों ही सूरतों के अंजाम भयावह होंगे। विपक्ष ने ऐसा रसगुल्ला दिखाया सत्ताधारी दल की उन रेवड़ियों के जवाब में जहाँ प्रत्येक गरीब किसान को सालाना छह हज़ार का सरकारी अनुदान और प्रधानमंत्री श्रम योगी मान-धन योजना के अंतर्गत पेंशन के प्रावधान लागू कर दिया। ऐसी रेवड़ियां और रसगुल्ले बांटने में राष्ट्रीय दल ही नहीं बल्कि क्षेत्रीय दल भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं।
कुल मिलाकर यह चुनाव, चुनाव कम रेवड़ी-रसगुल्लों का खेल ज्यादा है। मतदाताओं को इनका आंकलन ऐसी योजनाओं के दूरगामी परिणाम और भावी पीढ़ियों के हितों को देखकर करना चाहिए। मतदाताओं का आने वाली पीढ़ियों के प्रति दायित्व बनता है कि सरकार ऐसी चुनें जो रोजगार के अवसर पैदा करे, भ्रष्टाचार पूरी तरह खत्म न कर सके तो न्यूनतम भ्रष्ट हो, शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान दे, किसानों को फसल का उचित भाव मिले, इंफ्रास्ट्रक्चर का तेजी से विकास हो, सुरक्षा का माहौल बने, अपराधों पर लगाम लगे, न्यायालयों में कई वर्षों से लंबित केसों के अतिशीघ्र निपटारा हो इत्यादि। लोकतंत्र के पर्व के आगाज़ हो चुका है, ऊपरवाले से प्रार्थना है कि मतदाताओं को सर्वाधिक उपयुक्त विकल्प चुनने की सद्बुद्धि दे। जय लोकतंत्र।
– आशीष पाठक की कलम से
(स्वतंत्र समीक्षक)