भारतीय जनता पार्टी: वैकल्पिक राजनीति की प्रणेता

आज भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की स्थापना के 39 वर्ष पूरे हो गए। भाजपा के सभी प्रदेश एवं राष्ट्रीय कार्यालयों पर स्थापना दिवस धूमधाम से मनाया गया। यह जश्न और अधिक महत्त्वपूर्ण और उत्साहवर्धक हो जाता है जब पार्टी दिल्ली की कुर्सी के साथ साथ 18 राज्यों में सत्ता पर काबिज हो। ऐसे में लोकतंत्र के महापर्व (चुनाव) का होना इस उत्साह में चार चाँद लगा देता है। आज पार्टी के सभी नेताओं ने स्थापना दिवस की बधाइयाँ सोशल मीडिया की सहायता से साझा की।

मुझे जिज्ञासा हुयी इस पार्टी के इतिहास को जानने की, अब जब जिज्ञासा हुयी तो शांत करने के लिए सहारा लिया कंप्यूटर का। 6 अप्रैल 1980  को  गठित भाजपा साल 2018 के अनुसार राष्ट्रीय संसद और राज्यों की विधानसभाओं के प्रतिनिधित्व के लिहाज से देश की सबसे बड़ी पार्टी बानी और प्राथमिक सदस्यता के लिहाज से दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। साल 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना हुयी थी, जिसका आपातकाल की समाप्ति पर साल 1977 में जनता पार्टी में विलय किया ताकि कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया जा सके। हालाँकि जनता पार्टी की सरकार केवल तीन साल ही चल सकी और साल 1980 में पार्टी विघटित हो गयी और जन्म हुआ भाजपा का।

भाजपा ने जीत का स्वाद चखा साल 1984 में और मात्र 2 सीटों पर विजयी हुयी। भाजपा जनसंघ का ही आधुनिक रूप थी जो कि पूर्व में कई गुना अच्छा प्रदर्शन कर चुकी थी इसलिए मात्र 2 सीटों पर जीत निराशाजनक थी, लेकिन इस चुनाव में कांग्रेस ने आजतक के सबसे अच्छा प्रदर्शन किया था और 414 सीटें हासिल की थी और इस बम्पर जीत का कारण थी सहानुभूति की लहर। दरअसल साल 1984 के चुनाव से पहले देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा प्रियदर्शिनी गाँधी की निर्मम हत्या उन्हीं के सुरक्षाकर्मियों द्वारा कर दी गयी। इसके बाद भड़के सिख दंगे और देश को सामना करना पड़ा आम चुनावों का। इस चुनाव में स्वर्गीय श्री राजीव गाँधी के नेतृत्व में ऐसी ऐतिहासिक जीत हुयी की वैसा प्रदर्शन कांग्रेस आज तक नहीं दोहरा सकी। भाजपा के लिए मात्र 2 सीटों पर जीत झटका तो थी लेकिन संगठन ने अपना काम जारी रखा और साल 1989 के आम चुनावों में एक ऊंची छलांग लगाते हुए 85 सीटों पर कब्ज़ा किया।

इस अध्ययन के दौरान पता चला कि कैसे भाजपा अपने गठन के दस सालों में ही मुख्य विपक्षी दल बन गयी। भाजपा ने अपने गठन के बाद से साल 1999 तक लगातार अपने ही प्रदर्शन की निखारा और पार्टी 2 सीटों से 182 तक पहुँच गयी। यह दौर था जब भाजपा ने जिस रफ़्तार से तरक्की की, कांग्रेस उसी रफ़्तार के साथ कमजोर हुयी और 414 से 114 सीटों पर सिमट गयी। भारतीय लोकतंत्र का यह वो दौर था जब एक पार्टी उभर रही थी, एक वर्षों पुरानी पार्टी की पकड़ ढीली हो रही थी और कई क्षेत्रीय दलों का गठन हो रहा था। इस बदलाव के कारण था कि साल 1984 के बाद कोई पूर्ण बहुमत वाली सरकार सत्तासीन न हो सकी और भाजपा अब कांग्रेस के विकल्प के तौर पर स्थापित हो चुकी थी। साल 1999 तक तो भाजपा का सफर काफी मजेदार रहा, सीटें लगातार बढ़ रही थीं, स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सत्ता का स्वाद चख चुकी थी। लेकिन भाजपा गठबंधन की सरकार चला रही थी जिसकी अपनी मजबूरियां और सीमायें थी, न्यूनतम साझा कार्यक्रम के साथ आगे बढ़ना था। इसका परिणाम हुआ की एक करिश्माई व्यक्तित्व, साफ़-सुथरी छवि और बेदाग़ नेता होते हुए भी श्री वाजपेयी कोई करिश्मा न दिखा सके और जनता अब और भरोसा न कर सकी। अब दौर आया था जहाँ से भाजपा कमजोर पड़ने लगी जिसके कई कारण थे जैसे श्री वाजपेयी जी की सरकार का साधारण सा प्रदर्शन, उनकी बढ़ती उम्र, गुजरात के तथाकथित दंगे, भाजपा की ऐसी नीतियां जिनका परिणाम आने में वर्षों लगे, श्री लाल कृष्ण आडवाणी की कट्टर हिंदुत्व वाली छवि और श्रीमती सोनिया गाँधी का राजनीति में प्रवेश। कांग्रेस अपने जनाधार में तो कोई अर्थपूर्ण बदलाव तो न ला सकी किन्तु सबसे बड़े दल के रूप में साल 2004 में उभरी, कई छोटे दलों के सहयोग से यूपीए की सरकार बनी। सरकार ने ठीक-ठाक तरीके से पांच साल तक काम-काज संभाला। इस दौरान स्वर्गीय श्री वाजपेयी जी सक्रिय राजनीति से संन्यास ले चुके थे और अस्वस्थ चल रहे थे। साल 2005 में स्वर्गीय श्री वाजपेयी जी ने श्री आडवाणी जी और स्वर्गीय श्री प्रमोद महाजन जी को अपना “राम-लक्ष्मण” बताकर उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। स्वर्गीय श्री महाजन जी की असामयिक मृत्यु के कारण श्री आडवाणी जी भाजपा के अकेले खेवनहार बचे जिनकी अत्यधिक हिंदुत्व वाली छवि ने साल 2009 में चुनावी माहौल में जितना अनुकूल असर डाला उससे कहीं अधिक प्रतिकूल असर डाला और गुजरात दंगों ने इस आग में घी का काम किया।

अब तक भारतीय लोकतंत्र में वो दौर आ चुका था कि पूर्ण बहुमत वाली सरकार एक सपने के सामान लगती थी और जो राजनेता या पार्टी ऐसी बातें करती थी उसकी तुलना  शेख चिल्ली के हसीन सपनों से कर दी जाती थी। साल 2009 में कांग्रेस के जनाधार अपेक्षाकृत तो बढ़ा लेकिन पूर्णबहुमत से काफी दूर था, कांग्रेस जहाँ 206 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में आयी तो भाजपा और कमजोर होकर 116 सीटों तक पहुँच गयी थीं, यूपीए-2 का गठन हुआ। इस सरकार में श्री मनमोहन सिंह ने पुनः सरकार का नेतृत्व किया किन्तु उनकी सरकार पर साल 2004 से कांग्रेस मुख्यालय से चलने के आरोप लगा। अब तक भाजपा खेमे में नयी लामबंदी शुरू हो चुकी थीं, भाजपाइयों में अकुलाहट थी और तभी आर एस एस जो कि भाजपा का मातृत्व संगठन रहा है, ने दांव खेला श्री नरेंद्र मोदी पर। श्री मोदी पर गुजरात दंगो के दाग था हालाँकि तब तक सी बी आई उन्हें क्लीन चिट दे चुकी थी, दूसरा डर था की पुराने भाजपायी उनके साथ चलने को तैयार न थे। एक बार लगा कि भाजपा की अंदरूनी कलह उन्हें और पीछे ले जा सकती है लेकिन श्री मोदी ने सभी साथियों को आश्वस्त किया और भाजपा चल निकली यूपीए-2 कि दौरान हुए एक के बाद एक हुए घोटालों को भुनाने में। साल 2014 के चुनाव परिणामों ने सबको चौंका दिया था, कोई कल्पना नहीं कर सका था कि भारतवर्ष में पूर्णबहुमत वाली सरकार बन सकती है। भारतीय मीडिया तीस वर्ष बाद हुए उलट-फेर को अविश्वसनीय मान रहा था। एक महत्वपूर्ण एवं कारगर कदम जो भाजपा ने उठाया वो यह कि पूर्ण बहुमत हासिल करने के बाद भी सहयोगी दलों को साथ रखा, न केवल साथ रखा बल्कि उनको कैबिनेट में जगह देकर सरकार का हिस्सा बनाया। आगामी चुनावों में अगर पूर्ण बहुमत की स्थिति न बन पायी तो भाजपा को इस नीति का असली लाभ मिलना तय है। वर्तमान में साल 2019 के चुनाव का महापर्व चल रहा है, प्रत्याशी घोषित हो रहे हैं, घोषणापत्र जारी हो रहे हैं और जनता टकटकी लगाए हुए है। भाजपा का घोषणापत्र अभी बाकी है। भाजपा को जनता से और जनता को भाजपा से ढेर सारी उम्मीदें हैं।

स्वतंत्र टिपण्णी: एक लेखक और चुनावी विश्लेषण का प्रशिक्षु होने के नाते, मेरा अपना मत है कि भारत की जनता को सम्मान से जीने का हक़ मिले, शांति और सौहार्द्र का माहौल बने, शिक्षा का प्रसार हो कि जनता अपना भले-बुरे के आकलन कर सके, भ्रष्टाचार पूर्णतया समाप्त न हो सके तो न्यूनतम हो, सरकारी नीतियों के लाभ जनता तक पहुंचें, बिचौलियों का राज खत्म हो, रोजगार कि अवसर बढ़ें, सरकारी अनुकम्पा समाप्त हो। सरकार यदि सच में विकास करना चाहती है रोजगारपरक नीतियां बनाये और उसमें सरकारी सहायता का प्रावधान करे, मसलन किसी को घर बैठे-बैठे सरकारी सहायता देकर निकम्मा करना या नाकारापन फैलाना समस्या के समाधान नहीं है, आप किसानों को बिजली पानी खाद मुफ्त में दें, फसलों के समर्थन मूल्य बढ़ाएं, फसल की ईमानदारी से सरकारी खरीद हो, न्यूनतम मजदूरी दर को बढ़ाया जाये, रोजगार सृजन करने वाली इकाइयों को बढ़ावा दें, छोटे व्यापारियों को सहूलियतें दें, आयकर को समय के साथ कम करते हुए ख़त्म करें, निर्यात को सुगम बनाते हुए देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करें।  मैं ऐसी सोच वाले राजनीतिक दल को बढ़ावा देने के पक्षधर हूँ।

– आशीष पाठक की कलम से
(स्वतंत्र समीक्षक)

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