सड़क दुर्घटनाएं: असली वजहें क्या है

भारत में सड़क दुर्घटनाओं का आंकड़ा अगर देखा जाये तो बहुत ही डरावनी कहानी कहता है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपे लेख में बताया गया कि भारत में सड़क दुर्घटनाओं में प्रत्येक वर्ष एक मझोली आबादी वाला शहर खो देता है। जब आप कहते हैं कि फलां साल में इतने हजार दुर्घटनाएं हुयी तो बात आयी गयी हो जाती है। लेकिन जब आप आंकड़ों की तह तक जाएँ तो पता चलता है कि लगभग प्रत्येक मिनट एक सड़क दुर्घटना हो रही है और प्रत्येक तीन मिनट में एक इंसान अपनों को अलविदा कह जाता है। इन सड़क दुर्घटनाओं में जान खोने वालों में आधी आबादी 18-35 आयु वर्ग की होती है और अगर बात की जाये 18-45 आयु वर्ग की तो आंकड़ा दो-तिहाई से भी ज्यादा है।

उपलब्ध आंकड़े एक डरावनी स्थिति की तरफ स्पष्ट इशारा करते हैं तो इसके लिए जिम्मेदार कारणों का विस्तार से अध्ययन होना चाहिए। हालाँकि भारत ने साल 2015 में ब्राजीलिया घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करके सड़क दुर्घटनाओं की संख्या आधी करने की प्रतिबद्धता दिखाई है और इसे काफी गंभीरता से लिया है। अभी हाल ही में नागपुर में हुए टीवी शो की दौरान भारत के सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री श्री नितिन जयराम गडकरी ने स्वीकार किया कि वर्तमान सरकार सड़क दुर्घटनाओं के मामलों के लेकर गंभीर तो है लेकिन अभी तक इस क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य नहीं हो सका है। इसके लिए उन्होंने व्यापक पैमाने पर व्यवस्था में परिवर्तन लाने की बात कही है। सड़क दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार कारकों में कुछ तो बहुत ही सामान्य हैं जिनपर लगाम लगाकर सार्थक कमी लायी जा सकती है। इनके लिए कोई विशेष व्यवस्था परिवर्तन भी नहीं करना होगा।

जैसा कि सम्बंधित विभाग के मंत्री स्वयं जानते हैं कि हमारे देश में चालन प्रशिक्षण की कोई सुगठित व्यवस्था उपलब्ध नहीं है और बिना कोई प्रशिक्षण एवं परीक्षा के ड्राइविंग लाइसेंस बन जाते हैं क्योंकि हर कार्यालय में लाइसेंस बनवाने वाले दलालों का बोलबाला है। यही नहीं, कोई भी व्यक्ति इन्ही दलालों के माध्यम से एक से अधिक लाइसेंस भी प्राप्त कर लेता है और वह भी विभिन्न शहरों के। नशा करके वाहन चलाना भी सड़क दुर्घटनाओं के बड़े कारणों में एक है। इसके अतिरिक्त ट्रैफिक पुलिस को भी अत्यंत गंभीरता से सुधार की जरुरत है, ट्रैफिक पुलिस की अधिकांश टुकड़ियां अवैध वसूली पर ध्यान केंद्रित करती हैं। मैं स्वयं दिल्ली का हाल बता सकता हूँ कि दिल्ली से तकरीबन 300 निजी बसें प्रतिदिन निकलती हैं विभिन्न दिशाओं में जिनके पास उपयुक्त अनुमति भी नहीं होती, लेकिन पुलिस वसूली करके सबको जाने देती है। ट्रैफिक पुलिस में भ्रष्टाचार का इतना बोलबाला है कि यदि सरकार कोई ऐसा प्रावधान करे कि ट्रैफिक पुलिस कि लोगों को तनख्वाह मिलाने की बजाय अपनी जेब से सरकार को जमा करानी होगी तब भी शायद सभी तैयार हो जायेंगे। क्या यह पैसों का कलेक्शन ऊपर तक नहीं जाता? क्या लोकल इंटेलिजेंस को ऐसी हरकतों का पता नहीं होता? क्या एंटी करप्शन विभाग के लोग आँखें मूँद कर बैठे हैं? क्यों नहीं कोई कार्यवाही होती ऐसे भ्रष्ट लोगो के खिलाफ? इन सबके अलावा सड़क दुर्घटनाओं का एक मुख्य कारण चालक का ध्यान भंग होना भी है। आप किसी भी सड़क से गुजर जाइये, आपको तमाम तरह के सरकारी एवं गैर-सरकारी पोस्टर, बैनर, होर्डिंग लगे मिल जायेंगे। अब जाहिर है कि इतने पोस्टर, बैनर, होर्डिंग कोई बेवजह तो लगवायेगा नहीं, इन्हे लगवाने का उद्देश्य ही है की लोग इन्हें पढ़ें। जब तक वो लोग जो वाहन में सफर तो कर रहे हैं किन्तु वाहन चला नहीं रहे हैं तब तक तो ठीक है लेकिन तब क्या जब चालक का ध्यान इन पर चला जाये? आप गौर से देखेंगे तो पता चलेगा कि अधिकतर दोपहिया और चार पहिया वाहनों को उनके मालिक ही चला रहे होते हैं। यह तो वह कारण थे जिनका क्रियान्वयन पहले दिन से ही किया जा सकता है। इसके अलावा भी कुछ कारण ऐसे हैं जिनके क्रियान्वयन में समय एवं धन के निवेश की आवश्यकता होगी मसलन वाहन निर्माण के दौरान कुछ प्रभावी परिवर्तन लाये जा सकते हैं। और इसके साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास पर ध्यान देने की अत्यंत आवश्यकता है।

उपरोक्त कारणों की पहचान के बाद इनके समाधान पर मंथन करने की आवश्यकता है और केवल सरकार की इच्छा शक्ति पर ही निर्भर करेगा। कोई भी ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के लिए ट्रेनिंग अनिवार्य कर दी जानी चाहिए, इसके अतिरिक्त वाहन चालन परीक्षा की रिकॉर्डिंग की व्यवस्था हो जिसकी निगरानी केन्द्रीकृत कंट्रोल रूम द्वारा की जानी चाहिए और परीक्षा का परिणाम प्रत्येक राज्य में स्थित कंट्रोल रूम से ही आना चाहिए। इससे दलालों का बोलबाला काम हो जायेगा। इसके साथ ही सभी ड्राइविंग लाइसेंस को आधार से लिंक करना चाहिए ताकि कोई भी व्यक्ति एक से अधिक लाइसेंस न बनवा सके। नशेड़ी वाहन चालकों के विरुद्ध सख्त कार्यवाही की जाये, लाइसेंस निरस्त करके हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज किया जाये। ट्रैफिक पुलिस पर नकेल कसना एक मिनट का काम है अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो। ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों को निलंबित न करके उनकी सेवा समाप्त कर दी जानी चाहिए, चाहे वो ट्रैफिक पुलिस हो या फिर परिवहन विभाग। क्योंकि जब यह अधिकारी अपना काम ईमानदारी से नहीं करते हैं इसका सीधा मतलब है कि इन्होंने किसी कातिल को सड़क पर खुला छोड़ दिया है और सड़क दुर्घटना में इन अधिकारियों की अपरोक्ष जिम्मेदारी बनती है। बेरोजगारी की समस्या में भी कुछ हद तक कमी आएगी। सड़क के किनारे किसी भी प्रकार के सरकारी एवं गैर-सरकारी विज्ञापनों को तुरंत प्रभाव से बंद किया जाना चाहिए। विज्ञापनों कि लिए अख़बार, पत्रिकाएं, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, एवं अन्य भवनों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इसके कई फायदे होंगे, सरकारी आय बढ़ेगी, शहर साफ़ सुथरा  लगेगा और दुर्घटनाओं में कमी आएगी। वहां निर्माताओं पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है कि ऐसी व्यवस्था करें जिससे कि ड्राइवर कि ध्यान-भंग होने की गुंजाईश न्यूनतम हो जैसे की ड्राइवर को वीडियो देखने की व्यवस्था न हो, म्यूजिक कंट्रोल करने वाले बटन सुगम बनाये जाएँ, सभी वाहनों में इन-बिल्ट स्पीड गवर्नर का प्रावधान हो इत्यादि। इन सब के अतिरिक्त अधिक से अधिक अंडरपास, फुट-ओवर ब्रिज बनाये जाएँ, मुख्य सड़क पर आने से पहले सर्विस रोड का प्रावधान हो, रोड डिवाइडर में अवैध कट न हों, कट पाए जाएँ तो सम्बंधित अधिकारियों कि विरुद्ध आवश्यक कार्यवाही हों, उन पर गैर इरादतन हत्या का मुक़दमा चले। रोड पार करने के लिए केवल अधिकृत स्थानों का ही उपयोग संभव होना चाहिए, अन्य स्थानों पर डिवाइडर ब्लॉक रखने की समुचित व्यवस्था हों। इन सबके साथ ही सम्बंधित मंत्रालय/विभाग को सड़क के रख-रखाव एवं मरम्मत की उचित व्यवस्था करनी चाहिए, सड़कें खड्ढामुक्त होनी चाहिए। साथ ही पर्याप्त दृश्यता, सड़क के अक्षम डिज़ाइन और इंजीनियरिंग को भी जहाँ-जहाँ सुधार की आवश्यकता है, तत्काल किये जाने चाहिए।

जिन सुधारों के क्रियान्वयन में समय एवं धन के निवेश की आवश्यकता है उसे सम्बंधित मंत्रालय को प्राथमिकता पर रखना चाहिए और साथ ही ऐसे सुधार जिनमें केवल इच्छाशक्ति की आवश्यकता है को तुरंत प्रभाव से लागू करना चाहिए। इसके लिए यदि कानून में प्रावधान करने की या संशोधन करने की आवश्यकता हो तो भी तुरंत कड़े कदम उठाये जाने चाहिए। अन्यथा हम प्रत्येक वर्ष गंगटोक, फगवाड़ा या मोतिहारी जैसे शहरों के बराबर की आबादी खोते रहेंगे। एक व्यक्ति का इस दुनिया से यूँ चले जाना कितना दर्दनाक होता है इसका दर्द वही जान सकता है जिसने इस पीड़ा को किसी न किसी रूप में अनुभव किया हो। इसलिए इस क्षेत्र में तत्काल ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है अन्यथा यह मान लिया जाना चाहिए कि अन्य लोगों के साथ सरकार/मंत्रालय भी जनता को सुरक्षित न रख पाने के अपराध के सह-आरोपी हैं।

– आशीष पाठक की कलम से
(स्वतंत्र समीक्षक)

निष्पक्ष पत्रकारिता: क्या है हकीकत

हमारे देश में निष्पक्ष पत्रकारिता हमेशा से ही सवालों के घेरे में रही है। बड़े-बड़े न्यूज़ चैनल्स पर, अखबार प्रकाशकों पर और अब ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल्स पर हमेशा ही आरोप लगते रहे हैं पक्षपात के। क्या इन आरोपों में कोई सत्यता है? क्या पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता हकीकत है? क्या पेड न्यूज़ और झूठे नैरेटिव के आरोपों में कोई सच्चाई है? अगर इन सवालों के जवाब हाँ में है तो जरूरी हो जाता है कि सच्चाई की खोज की जाये और प्रकाशित भी की जाये।

आम जनता से बात की जाये तो आपको स्पष्ट हो जाता है कि कौन सा चैनल किस राजनीतिक दल को सपोर्ट करते हैं और कौन सा चैनल किस दल के विरोध करते है। यही कहानी अख़बारों के बारे में है और ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल्स के बारे में भी यही बातें कही जाती हैं। आप ऐसा होने के कारणों की विस्तृत जांच करें तो पता चलता है हकीकत क्या है। क्यों आम जनता इनके बारे में ऐसा सोचती है? क्यों आम जनता को लगता है कि उसे निष्पक्ष पत्रकारिता का अभाव है? इसका सीधा सा जवाब है स्वार्थ और लालच, मान-सम्मान का, अवार्ड्स का, पैसों का, निजी बदले लेने का, शोहरत पाने का। इस पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता के लिए जिम्मेदार हैं राजनैतिक दल, कॉर्पोरेट हाउसेस और उनके एजेंट्स। आचार्य चाणक्य ने कहा है लालच बुद्धि पर पर्दा डाल देता है और यह भी कहा है कि हर मित्रता के पीछे कोई ना कोई स्वार्थ जरूर होता है, ऐसी कोई मित्रता नहीं, जिसमें स्वार्थ ना हो और यह कड़वा सच है।

हमारे देश में रिश्वत का चलन काफी पुराना है, कोई नकद में विश्वास करता है कोई वस्तुओं के लेन-देन में। आमतौर पर देखा गया है कि ऐसी रिश्वतें देने के पीछे काफी बड़ा खेल होता है। रिश्वत दी जाती है सच्ची खबर छिपाने के लिए, झूठी खबर चलने के लिए, प्रतिद्वंदियों को नीचा दिखाने के लिए या फिर कोई नैरेटिव फ़ैलाने के लिए। आपने सुना होगा कि पत्रकारों को रेल किराए में छूट मिलती है, ऐसा अब तक सभी पूर्ववर्ती सरकारें करती आयी हैं। कोई भी सरकार ऐसी छूट वापस लेकर पत्रकारों के कोप-भाजन का शिकार नहीं होना चाहती। अभी हाल ही दिल्ली के मुख्यमंत्री ने मांग कर दी सभी पत्रकारों को टोल-टैक्स से छूट दी जानी चाहिए। किस पत्रकार को तनख्वाह नहीं मिलती या किस पत्रकार की आधिकारिक यात्रा का सारा खर्चा उसका ओफिस नहीं उठाता? यह एक प्रयास था पत्रकारों को लुभाने का। ऐसा नहीं है कि ऐसा पहली बार हुआ था, बल्कि इस से पहले भी ऐसे रसूखदार पत्रकारों को पद्म पुरुस्कारो से नवाज़ा जाता रहा है, राजनीतिक दल अपने प्रभाव का उपयोग कर कॉर्पोरेट कम्पनीज से विज्ञापन दिलवाकर अपने हक़ में पत्रकारिता करवाते रहे हैं।

कुछ पत्रकारों पर आरोप लगता है कि पूर्ववर्ती सरकारों में उनको पुरुस्कार, सम्मान राशि और अन्य लाभ पहुँचते रहे हैं और जब भी अवसर आता है उन पत्रकारों को नमक का हक़ अदा करना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ यही एक कारण हो पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता का, इसके अलग भी निजी वैर-भाव इसका एक कारण रहता है। किसी राजनेता ने किसी पत्रकार को ज्यादा देर इंतज़ार करवा दिया या फिर इंटरव्यू देने से मना कर दिया या फिर सवालों के पूछे जाने को लेकर कोई शर्त रख दी या फिर किसी सवाल के जवाब में पत्रकार की निष्पक्षता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया, किसी विशेष अवसर पर किसी विशेष पत्रकार की पत्रकारिता को गलत ठहरा दिया वगैरह वगैरह। मुझे एक प्रकरण याद आता है कि एक विशेष न्यूज़ चैनल के कुछ पत्रकार पक्षपाती रवैय्ये के लिए जाने जाते थे, एक घटना के दौरान चैनल पर सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने का आरोप लगाया और कार्यवाही कर दी। न्यूज़ चैनल को एक दिन के लिए ऑफ-एयर कर दिया गया, हश्र यह हुआ की चैनल और ज्यादा उग्रता के साथ पेश आने लगा और जहाँ कुछ पत्रकारों पर पक्षपाती होने का आरोप लगता था वहीँ पूरे न्यूज़ चैनल पर पक्षपाती होने का आरोप लगाने लगा। ऐसे ही अन्य प्रकरण में, एक पत्रकार ने एक बड़े कॉर्पोरेट घराने जो कि राजनीति में होने कि साथ साथ घोटाले में आरोपी भी थे कि साथ स्टिंग ऑपरेशन किया और कोशिश की कि वह लोग खबर को दबाने कि लिए रिश्वत देने को राज़ी हो जाएँ जिससे घोटाले की बात साबित हो जाये, लेकिन दांव उल्टा पड़ गया उनपर खुद एक स्टिंग ऑपरेशन हो गया और पैसे ऐंठने का आरोप लगा। अब पत्रकार और उनके साथी को सरकार कि प्रभाव में जेल हो गयी। परिणाम यह हुआ कि पूरे का पूरा न्यूज़ चैनल उस सरकार कि विरुद्ध खड़ा हो गया। ऐसा ही कुछ होता है जब राजनीतिक दल न्यूज़ चैनल्स, अख़बार प्रकाशकों और ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल्स की फंडिंग करने लगते हैं। इस फंडिंग का उद्देश्य या तो अपने पक्ष में मनमानी न्यूज़ चलवाने कि लिए होता है या फिर विरोधियों को घेरने कि लिए। दोनों हो सूरतों में पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता का बढ़ावा मिलता है क्योंकि गाहे-बेगाहे आपको अपने आकाओं की बात माननी ही पड़ेगी।

राजनीतिक दलों को भी पत्रकारिता के पेशे का सम्मान करना चाहिए। जिस प्रकार पत्रकारिता एक माध्यम है जनता तक राजनीतिक दलों की आवाज़ पहुँचाने का उसी प्रकार पत्रकारिता का धर्म कहता है की जनता के हित के सवाल राजनेताओं से पूछे जाएँ। जो कुछ भी राजनेता  आम जनता के लिए करते हैं उसके लिए तारीफ होनी चाहिए यद्यपि ऐसा करना उनकी जिम्मेदारी है। पत्रकार तो जनता की आवाज़ है और उसे आज़ादी है कि वह उन लंबित पड़े मुद्दों को उठाये जो कि राजनेताओं ने पूरे नहीं किये हैं। राजनीतिक दलों की मंशा पर या उनके क्रियाकलापों पर सवाल पूछना देशद्रोह नहीं बल्कि नैतिक जिम्मेदारी है। राजनेताओ को सवालों के जवाब देने चाहिए न कि भागना चाहिए।

राजनीतिक दलों में भी कुछ नेता ऐसे होते हैं जो पत्रकारों से सेटिंग रखते हैंऔर मनमानी न्यूज़ चलवाने का माद्दा रखते हैं। यही राजनेता उन तथाकथित पत्रकारों का उपयोग अपने दल की स्वार्थ सिद्धि के लिए करते हैं। और जब यह सब होने लगता हैं तो पत्रकारों के साथ-साथ न्यूज़ चैनल, अखबार प्रकाशक और ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल पर ठप्पा लग जाता हैं कि वो किस दल कि लिए पक्षपाती रवैय्या अपनाते हैं। ऐसे में मुश्किल में पड़ जाते हैं वो निष्पक्ष पत्रकार जिन्हें निष्पक्ष रहने के बावजूद कीमत अदा करनी पड़ती हैं पक्षपाती संस्थान में काम करने की। और यदि आपको लगता है कि ऐसा सिर्फ पत्रकारिता की दुनिया में हो रहा है तो आपका अंदाज़ा गलत है। यही कहानी दोहराई जाती है फिल्मकारों में, इतिहासकारों में, तथाकथित बुद्धिजीवियों में, लेखकों में और बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों में भी। यह स्वार्थ और लालच की नीति इस देश कि संस्कारों को दिन-प्रतिदिन खोखला कर रही है। राजनीतिक दलों को ही नहीं, बल्कि सभी उद्यमों के पेशेवरों को भी ऐसी परिस्थितियों से बचना चाहिए और आम जनता के विश्वास के साथ छल नहीं करना चाहिए।


– आशीष पाठक की कलम से
(स्वतंत्र समीक्षक)

भारतीय जनता पार्टी: वैकल्पिक राजनीति की प्रणेता

आज भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की स्थापना के 39 वर्ष पूरे हो गए। भाजपा के सभी प्रदेश एवं राष्ट्रीय कार्यालयों पर स्थापना दिवस धूमधाम से मनाया गया। यह जश्न और अधिक महत्त्वपूर्ण और उत्साहवर्धक हो जाता है जब पार्टी दिल्ली की कुर्सी के साथ साथ 18 राज्यों में सत्ता पर काबिज हो। ऐसे में लोकतंत्र के महापर्व (चुनाव) का होना इस उत्साह में चार चाँद लगा देता है। आज पार्टी के सभी नेताओं ने स्थापना दिवस की बधाइयाँ सोशल मीडिया की सहायता से साझा की।

मुझे जिज्ञासा हुयी इस पार्टी के इतिहास को जानने की, अब जब जिज्ञासा हुयी तो शांत करने के लिए सहारा लिया कंप्यूटर का। 6 अप्रैल 1980  को  गठित भाजपा साल 2018 के अनुसार राष्ट्रीय संसद और राज्यों की विधानसभाओं के प्रतिनिधित्व के लिहाज से देश की सबसे बड़ी पार्टी बानी और प्राथमिक सदस्यता के लिहाज से दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। साल 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना हुयी थी, जिसका आपातकाल की समाप्ति पर साल 1977 में जनता पार्टी में विलय किया ताकि कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया जा सके। हालाँकि जनता पार्टी की सरकार केवल तीन साल ही चल सकी और साल 1980 में पार्टी विघटित हो गयी और जन्म हुआ भाजपा का।

भाजपा ने जीत का स्वाद चखा साल 1984 में और मात्र 2 सीटों पर विजयी हुयी। भाजपा जनसंघ का ही आधुनिक रूप थी जो कि पूर्व में कई गुना अच्छा प्रदर्शन कर चुकी थी इसलिए मात्र 2 सीटों पर जीत निराशाजनक थी, लेकिन इस चुनाव में कांग्रेस ने आजतक के सबसे अच्छा प्रदर्शन किया था और 414 सीटें हासिल की थी और इस बम्पर जीत का कारण थी सहानुभूति की लहर। दरअसल साल 1984 के चुनाव से पहले देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा प्रियदर्शिनी गाँधी की निर्मम हत्या उन्हीं के सुरक्षाकर्मियों द्वारा कर दी गयी। इसके बाद भड़के सिख दंगे और देश को सामना करना पड़ा आम चुनावों का। इस चुनाव में स्वर्गीय श्री राजीव गाँधी के नेतृत्व में ऐसी ऐतिहासिक जीत हुयी की वैसा प्रदर्शन कांग्रेस आज तक नहीं दोहरा सकी। भाजपा के लिए मात्र 2 सीटों पर जीत झटका तो थी लेकिन संगठन ने अपना काम जारी रखा और साल 1989 के आम चुनावों में एक ऊंची छलांग लगाते हुए 85 सीटों पर कब्ज़ा किया।

इस अध्ययन के दौरान पता चला कि कैसे भाजपा अपने गठन के दस सालों में ही मुख्य विपक्षी दल बन गयी। भाजपा ने अपने गठन के बाद से साल 1999 तक लगातार अपने ही प्रदर्शन की निखारा और पार्टी 2 सीटों से 182 तक पहुँच गयी। यह दौर था जब भाजपा ने जिस रफ़्तार से तरक्की की, कांग्रेस उसी रफ़्तार के साथ कमजोर हुयी और 414 से 114 सीटों पर सिमट गयी। भारतीय लोकतंत्र का यह वो दौर था जब एक पार्टी उभर रही थी, एक वर्षों पुरानी पार्टी की पकड़ ढीली हो रही थी और कई क्षेत्रीय दलों का गठन हो रहा था। इस बदलाव के कारण था कि साल 1984 के बाद कोई पूर्ण बहुमत वाली सरकार सत्तासीन न हो सकी और भाजपा अब कांग्रेस के विकल्प के तौर पर स्थापित हो चुकी थी। साल 1999 तक तो भाजपा का सफर काफी मजेदार रहा, सीटें लगातार बढ़ रही थीं, स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सत्ता का स्वाद चख चुकी थी। लेकिन भाजपा गठबंधन की सरकार चला रही थी जिसकी अपनी मजबूरियां और सीमायें थी, न्यूनतम साझा कार्यक्रम के साथ आगे बढ़ना था। इसका परिणाम हुआ की एक करिश्माई व्यक्तित्व, साफ़-सुथरी छवि और बेदाग़ नेता होते हुए भी श्री वाजपेयी कोई करिश्मा न दिखा सके और जनता अब और भरोसा न कर सकी। अब दौर आया था जहाँ से भाजपा कमजोर पड़ने लगी जिसके कई कारण थे जैसे श्री वाजपेयी जी की सरकार का साधारण सा प्रदर्शन, उनकी बढ़ती उम्र, गुजरात के तथाकथित दंगे, भाजपा की ऐसी नीतियां जिनका परिणाम आने में वर्षों लगे, श्री लाल कृष्ण आडवाणी की कट्टर हिंदुत्व वाली छवि और श्रीमती सोनिया गाँधी का राजनीति में प्रवेश। कांग्रेस अपने जनाधार में तो कोई अर्थपूर्ण बदलाव तो न ला सकी किन्तु सबसे बड़े दल के रूप में साल 2004 में उभरी, कई छोटे दलों के सहयोग से यूपीए की सरकार बनी। सरकार ने ठीक-ठाक तरीके से पांच साल तक काम-काज संभाला। इस दौरान स्वर्गीय श्री वाजपेयी जी सक्रिय राजनीति से संन्यास ले चुके थे और अस्वस्थ चल रहे थे। साल 2005 में स्वर्गीय श्री वाजपेयी जी ने श्री आडवाणी जी और स्वर्गीय श्री प्रमोद महाजन जी को अपना “राम-लक्ष्मण” बताकर उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। स्वर्गीय श्री महाजन जी की असामयिक मृत्यु के कारण श्री आडवाणी जी भाजपा के अकेले खेवनहार बचे जिनकी अत्यधिक हिंदुत्व वाली छवि ने साल 2009 में चुनावी माहौल में जितना अनुकूल असर डाला उससे कहीं अधिक प्रतिकूल असर डाला और गुजरात दंगों ने इस आग में घी का काम किया।

अब तक भारतीय लोकतंत्र में वो दौर आ चुका था कि पूर्ण बहुमत वाली सरकार एक सपने के सामान लगती थी और जो राजनेता या पार्टी ऐसी बातें करती थी उसकी तुलना  शेख चिल्ली के हसीन सपनों से कर दी जाती थी। साल 2009 में कांग्रेस के जनाधार अपेक्षाकृत तो बढ़ा लेकिन पूर्णबहुमत से काफी दूर था, कांग्रेस जहाँ 206 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में आयी तो भाजपा और कमजोर होकर 116 सीटों तक पहुँच गयी थीं, यूपीए-2 का गठन हुआ। इस सरकार में श्री मनमोहन सिंह ने पुनः सरकार का नेतृत्व किया किन्तु उनकी सरकार पर साल 2004 से कांग्रेस मुख्यालय से चलने के आरोप लगा। अब तक भाजपा खेमे में नयी लामबंदी शुरू हो चुकी थीं, भाजपाइयों में अकुलाहट थी और तभी आर एस एस जो कि भाजपा का मातृत्व संगठन रहा है, ने दांव खेला श्री नरेंद्र मोदी पर। श्री मोदी पर गुजरात दंगो के दाग था हालाँकि तब तक सी बी आई उन्हें क्लीन चिट दे चुकी थी, दूसरा डर था की पुराने भाजपायी उनके साथ चलने को तैयार न थे। एक बार लगा कि भाजपा की अंदरूनी कलह उन्हें और पीछे ले जा सकती है लेकिन श्री मोदी ने सभी साथियों को आश्वस्त किया और भाजपा चल निकली यूपीए-2 कि दौरान हुए एक के बाद एक हुए घोटालों को भुनाने में। साल 2014 के चुनाव परिणामों ने सबको चौंका दिया था, कोई कल्पना नहीं कर सका था कि भारतवर्ष में पूर्णबहुमत वाली सरकार बन सकती है। भारतीय मीडिया तीस वर्ष बाद हुए उलट-फेर को अविश्वसनीय मान रहा था। एक महत्वपूर्ण एवं कारगर कदम जो भाजपा ने उठाया वो यह कि पूर्ण बहुमत हासिल करने के बाद भी सहयोगी दलों को साथ रखा, न केवल साथ रखा बल्कि उनको कैबिनेट में जगह देकर सरकार का हिस्सा बनाया। आगामी चुनावों में अगर पूर्ण बहुमत की स्थिति न बन पायी तो भाजपा को इस नीति का असली लाभ मिलना तय है। वर्तमान में साल 2019 के चुनाव का महापर्व चल रहा है, प्रत्याशी घोषित हो रहे हैं, घोषणापत्र जारी हो रहे हैं और जनता टकटकी लगाए हुए है। भाजपा का घोषणापत्र अभी बाकी है। भाजपा को जनता से और जनता को भाजपा से ढेर सारी उम्मीदें हैं।

स्वतंत्र टिपण्णी: एक लेखक और चुनावी विश्लेषण का प्रशिक्षु होने के नाते, मेरा अपना मत है कि भारत की जनता को सम्मान से जीने का हक़ मिले, शांति और सौहार्द्र का माहौल बने, शिक्षा का प्रसार हो कि जनता अपना भले-बुरे के आकलन कर सके, भ्रष्टाचार पूर्णतया समाप्त न हो सके तो न्यूनतम हो, सरकारी नीतियों के लाभ जनता तक पहुंचें, बिचौलियों का राज खत्म हो, रोजगार कि अवसर बढ़ें, सरकारी अनुकम्पा समाप्त हो। सरकार यदि सच में विकास करना चाहती है रोजगारपरक नीतियां बनाये और उसमें सरकारी सहायता का प्रावधान करे, मसलन किसी को घर बैठे-बैठे सरकारी सहायता देकर निकम्मा करना या नाकारापन फैलाना समस्या के समाधान नहीं है, आप किसानों को बिजली पानी खाद मुफ्त में दें, फसलों के समर्थन मूल्य बढ़ाएं, फसल की ईमानदारी से सरकारी खरीद हो, न्यूनतम मजदूरी दर को बढ़ाया जाये, रोजगार सृजन करने वाली इकाइयों को बढ़ावा दें, छोटे व्यापारियों को सहूलियतें दें, आयकर को समय के साथ कम करते हुए ख़त्म करें, निर्यात को सुगम बनाते हुए देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करें।  मैं ऐसी सोच वाले राजनीतिक दल को बढ़ावा देने के पक्षधर हूँ।

– आशीष पाठक की कलम से
(स्वतंत्र समीक्षक)

रेवड़ियां और रसगुल्ले: राजनीतिक दलों के हथकंडे

चुनावों की तारीख का ऐलान तो अभी कुछ ही दिनों पहले हुआ है लेकिन रेवड़ियों की बरसात काफी समय से जारी है। इतिहास बताता है कि साढ़े चार साल के कार्यकाल में किये विकास कार्यों और योजनाओं पर अंतिम छह महीने में की गयी घोषणाएं भारी पड़ती हैं। राजनीतिक दल बखूबी जान चुके हैं कि आम वोटर भुलक्कड़ होते हैं, ज्यादा पहले से किये विकास कार्य, जनहितैषी योजनाएं और घोषणाएं भूल जायेंगे इसलिए चुनाव की घोषणा के एकदम पहले रेवड़ियां बांटना ज्यादा फायदे का सौदा होता है।

ऐसा नहीं है कि इस प्रकार की रेवड़ियां मौजूदा सरकार ने बांटी है बल्कि ऐसी रेवड़ियां बांटने का इतिहास काफी लम्बा रहा है। पूर्ववर्ती सरकारों ने भी जमकर खजाने के द्वार खोले हैं लेकिन हमेशा ही चुनावों से ठीक पहले। और ऐसा भी कतई नहीं है कि रेवड़ियां बांटने के अधिकार सिर्फ सरकार के पक्ष को है, विपक्ष भी रसगुल्ले खिलाने के ख्वाब दिखाता है लेकिन सिर्फ चुनाव से पहले। पक्ष और विपक्ष दोनों को ही लगता है कि उसके प्रलोभन में ज्यादा दम है और वोटर को बहकाने में वही कामयाब हो जायेंगे।

साल 2004 में वाजपेयी सरकार के पास गिनवाने के लिए सार्थक मुद्दों का स्पष्ट अभाव था इसलिए वह “इंडिया शाइनिंग” और “फील गुड फैक्टर” के भरोसे चुनाव मैदान में उतरी और महज 138 सीटें जीतकर दूसरे स्थान पर रही जबकि साल 1996  के बाद से सत्ता से दूर रही कांग्रेस मात्र 145 सीटें जीतकर खंडित जनादेश के बावजूद गठजोड़ वाली सरकार बनाने में कामयाब रही। कांग्रेस की इस जीत में जितना योगदान वादों और आश्वासनों का रहा उससे कहीं ज्यादा योगदान रहा भाजपा के अतिआत्मविश्वास, अतिउत्साह और बेहद अक्षम चुनावी रणनीति का। भाजपा का मानना था कि उसकी जनहितैषी योजनाएं उसे वोट दिलवाएंगी जबकि हकीकत यह थी कि उनकी योजनाएं इतनी दूरगामी थी पांच साल में कोई ठोस परिणाम न दिखा पायीं। इसके उलट साल 2009 में कांग्रेस 145 के मुकाबले 206 सीटें जीती और जैसे तैसे सत्ता के द्वार पर पहुँच गयी। इस आम चुनाव में भाजपा के पास न तो वाजपेयी सरकार की गठबंधन वाली मजबूर सरकार की उपलब्धियां थी और न ही मनमोहन सरकार के खिलाफ कोई ठोस मुद्दा और न ही कोई लोकलुभावन वादे, कुल मिलाकर रसगुल्लों की अनुपस्थिति रही। जबकि कांग्रेस के पास था मनरेगा, कामनवेल्थ के चलते विकसित हो रहा इंफ्रास्ट्रक्चर, राइट टू इनफार्मेशन नाम के मुद्दे और साथ ही मुफ्त अनाज़, खाद्य सुरक्षा बिल, ज्यादा प्रभावी मनरेगा जैसी रेवड़ियां। फिर आया साल 2014 और साथ ही आया मनमोहन सरकार के दौरान हुए घोटालों के उजागर होने का दौर, तभी वक़्ती नब्ज़ को देखते हुए भाजपा ने मैदान में उतारा तीन बार के मुख्यमंत्री और शब्दों के बाज़ीगर नरेंद्र मोदी को। नरेंद्र मोदी ने न केवल मनमोहन सरकार के एक बाद एक खुलते जा रहे भ्रस्टाचार के मुद्दों को भुनाया बल्कि जनता में रसगुल्ले रूपी ऐसे सपने दिखाए कि लगा कि नरेंद्र मोदी ही इस देश की एकमात्र उम्मीद हैं। भ्रष्टाचार उन्मूलन और काले धन के वापसी के साथ ही बेरोजगारी मुख्य निर्णायक मुद्दे रहे। हालांकि चुनाव परिणाम ने यह बात सिद्ध भी कर दिखाई जब भारतीय लोकतंत्र तीस साल बाद पूर्ण बहुमत वाली सरकार का गवाह बना। कहने का मतलब स्पष्ट है कि चुनाव सरकार की उपलब्धियों और विपक्ष के वादों के बीच की जंग है। सिंहासन उसी को मिलता है जिसकी रेवड़ी या रसगुल्लों में मिठास ज्यादा हो।

बीते ज़माने की बातों को भुलाकर चलिए मौजूदा चुनाव की बात करते हैं। साल 2014 में सत्ताधारी दल ने चुनावी वादे रुपी रसगुल्ला दिखाया था आयकर की सीमा को बढ़ाने का, क्या हुआ और कब, जनाब साल 2019 के चुनाव से ठीक पहले। साढ़े चार साल तक इस विषय पर मौन रहने वाले वित्तमंत्री ने हाल ही में पेश किये गए अंतरिम बजट में यह घोषणा कर दी, शायद यह सोचकर कि इनकम टैक्स रिटर्न भरने के आसपास चुनाव होंगे तो कोई समझदार वोटर कैसे भूल पायेगा कि अगले वित्त वर्ष में टैक्स की मार कुछ कम पड़ेगी। कुछ ऐसी ही सोच रही होगी जब विपक्ष ने हाल ही में “न्याय” नाम की योजना का रसगुल्ला दिखाया। वह विपक्ष जो कि मुख्य विपक्षी दल भी नहीं बन सका था पिछले आम चुनावों में, अपने दशकों पुराने अनुभव की चाशनी में डूबा रसगुल्ला दिखा कर लुभाने का प्रयास किया। विपक्ष को घोषणा करने की ऐसी जल्दी कि लाभ हानि का विचार किये बिना प्रेस कांफ्रेंस कर डाली। विपक्षी दल ने बताया कि सबसे गरीब बीस प्रतिशत ऐसे परिवार जिनकी मासिक आय बारह हज़ार रुपयों से जितनी कम होगी उतना ही सरकारी अनुदान मिलेगा, अगर उनका दल सत्ता में आया तो। ऐसी योजना की घोषणा दो सूरतों में ही की जा सकती है, पहली कि यह सिर्फ चुनावी वादा होगा जो कभी पूरी करना ही नहीं है और दूसरी यह कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र पर राज करना है तो आम जनता को नाकारा बनाकर रखा जाये। जब योजना ऐसी हो कि जो जितना कम कमायेगा उतना ही अधिक सरकारी अनुदान पायेगा तो कोई काम भला क्यों करेगा? दोनों ही सूरतों के अंजाम भयावह होंगे। विपक्ष ने ऐसा रसगुल्ला दिखाया सत्ताधारी दल की उन रेवड़ियों के जवाब में जहाँ प्रत्येक गरीब किसान को सालाना छह हज़ार का सरकारी अनुदान और प्रधानमंत्री श्रम योगी मान-धन योजना के अंतर्गत पेंशन के प्रावधान लागू कर दिया। ऐसी रेवड़ियां और रसगुल्ले बांटने में राष्ट्रीय दल ही नहीं बल्कि क्षेत्रीय दल भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं।

कुल मिलाकर यह चुनाव, चुनाव कम रेवड़ी-रसगुल्लों का खेल ज्यादा है। मतदाताओं को इनका आंकलन ऐसी योजनाओं के दूरगामी परिणाम और भावी पीढ़ियों के हितों को देखकर करना चाहिए। मतदाताओं का आने वाली पीढ़ियों के प्रति दायित्व बनता है कि सरकार ऐसी चुनें जो रोजगार के अवसर पैदा करे, भ्रष्टाचार पूरी तरह खत्म न कर सके तो न्यूनतम भ्रष्ट हो, शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान दे, किसानों को फसल का उचित भाव मिले, इंफ्रास्ट्रक्चर का तेजी से विकास हो, सुरक्षा का माहौल बने, अपराधों पर लगाम लगे, न्यायालयों में कई वर्षों से लंबित केसों के अतिशीघ्र निपटारा हो इत्यादि। लोकतंत्र के पर्व के आगाज़ हो चुका है, ऊपरवाले से प्रार्थना है कि मतदाताओं को सर्वाधिक उपयुक्त विकल्प चुनने की सद्बुद्धि दे। जय लोकतंत्र।

– आशीष पाठक की कलम से
(स्वतंत्र समीक्षक)