सड़क दुर्घटनाएं: असली वजहें क्या है

भारत में सड़क दुर्घटनाओं का आंकड़ा अगर देखा जाये तो बहुत ही डरावनी कहानी कहता है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपे लेख में बताया गया कि भारत में सड़क दुर्घटनाओं में प्रत्येक वर्ष एक मझोली आबादी वाला शहर खो देता है। जब आप कहते हैं कि फलां साल में इतने हजार दुर्घटनाएं हुयी तो बात आयी गयी हो जाती है। लेकिन जब आप आंकड़ों की तह तक जाएँ तो पता चलता है कि लगभग प्रत्येक मिनट एक सड़क दुर्घटना हो रही है और प्रत्येक तीन मिनट में एक इंसान अपनों को अलविदा कह जाता है। इन सड़क दुर्घटनाओं में जान खोने वालों में आधी आबादी 18-35 आयु वर्ग की होती है और अगर बात की जाये 18-45 आयु वर्ग की तो आंकड़ा दो-तिहाई से भी ज्यादा है।

उपलब्ध आंकड़े एक डरावनी स्थिति की तरफ स्पष्ट इशारा करते हैं तो इसके लिए जिम्मेदार कारणों का विस्तार से अध्ययन होना चाहिए। हालाँकि भारत ने साल 2015 में ब्राजीलिया घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करके सड़क दुर्घटनाओं की संख्या आधी करने की प्रतिबद्धता दिखाई है और इसे काफी गंभीरता से लिया है। अभी हाल ही में नागपुर में हुए टीवी शो की दौरान भारत के सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री श्री नितिन जयराम गडकरी ने स्वीकार किया कि वर्तमान सरकार सड़क दुर्घटनाओं के मामलों के लेकर गंभीर तो है लेकिन अभी तक इस क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य नहीं हो सका है। इसके लिए उन्होंने व्यापक पैमाने पर व्यवस्था में परिवर्तन लाने की बात कही है। सड़क दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार कारकों में कुछ तो बहुत ही सामान्य हैं जिनपर लगाम लगाकर सार्थक कमी लायी जा सकती है। इनके लिए कोई विशेष व्यवस्था परिवर्तन भी नहीं करना होगा।

जैसा कि सम्बंधित विभाग के मंत्री स्वयं जानते हैं कि हमारे देश में चालन प्रशिक्षण की कोई सुगठित व्यवस्था उपलब्ध नहीं है और बिना कोई प्रशिक्षण एवं परीक्षा के ड्राइविंग लाइसेंस बन जाते हैं क्योंकि हर कार्यालय में लाइसेंस बनवाने वाले दलालों का बोलबाला है। यही नहीं, कोई भी व्यक्ति इन्ही दलालों के माध्यम से एक से अधिक लाइसेंस भी प्राप्त कर लेता है और वह भी विभिन्न शहरों के। नशा करके वाहन चलाना भी सड़क दुर्घटनाओं के बड़े कारणों में एक है। इसके अतिरिक्त ट्रैफिक पुलिस को भी अत्यंत गंभीरता से सुधार की जरुरत है, ट्रैफिक पुलिस की अधिकांश टुकड़ियां अवैध वसूली पर ध्यान केंद्रित करती हैं। मैं स्वयं दिल्ली का हाल बता सकता हूँ कि दिल्ली से तकरीबन 300 निजी बसें प्रतिदिन निकलती हैं विभिन्न दिशाओं में जिनके पास उपयुक्त अनुमति भी नहीं होती, लेकिन पुलिस वसूली करके सबको जाने देती है। ट्रैफिक पुलिस में भ्रष्टाचार का इतना बोलबाला है कि यदि सरकार कोई ऐसा प्रावधान करे कि ट्रैफिक पुलिस कि लोगों को तनख्वाह मिलाने की बजाय अपनी जेब से सरकार को जमा करानी होगी तब भी शायद सभी तैयार हो जायेंगे। क्या यह पैसों का कलेक्शन ऊपर तक नहीं जाता? क्या लोकल इंटेलिजेंस को ऐसी हरकतों का पता नहीं होता? क्या एंटी करप्शन विभाग के लोग आँखें मूँद कर बैठे हैं? क्यों नहीं कोई कार्यवाही होती ऐसे भ्रष्ट लोगो के खिलाफ? इन सबके अलावा सड़क दुर्घटनाओं का एक मुख्य कारण चालक का ध्यान भंग होना भी है। आप किसी भी सड़क से गुजर जाइये, आपको तमाम तरह के सरकारी एवं गैर-सरकारी पोस्टर, बैनर, होर्डिंग लगे मिल जायेंगे। अब जाहिर है कि इतने पोस्टर, बैनर, होर्डिंग कोई बेवजह तो लगवायेगा नहीं, इन्हे लगवाने का उद्देश्य ही है की लोग इन्हें पढ़ें। जब तक वो लोग जो वाहन में सफर तो कर रहे हैं किन्तु वाहन चला नहीं रहे हैं तब तक तो ठीक है लेकिन तब क्या जब चालक का ध्यान इन पर चला जाये? आप गौर से देखेंगे तो पता चलेगा कि अधिकतर दोपहिया और चार पहिया वाहनों को उनके मालिक ही चला रहे होते हैं। यह तो वह कारण थे जिनका क्रियान्वयन पहले दिन से ही किया जा सकता है। इसके अलावा भी कुछ कारण ऐसे हैं जिनके क्रियान्वयन में समय एवं धन के निवेश की आवश्यकता होगी मसलन वाहन निर्माण के दौरान कुछ प्रभावी परिवर्तन लाये जा सकते हैं। और इसके साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास पर ध्यान देने की अत्यंत आवश्यकता है।

उपरोक्त कारणों की पहचान के बाद इनके समाधान पर मंथन करने की आवश्यकता है और केवल सरकार की इच्छा शक्ति पर ही निर्भर करेगा। कोई भी ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के लिए ट्रेनिंग अनिवार्य कर दी जानी चाहिए, इसके अतिरिक्त वाहन चालन परीक्षा की रिकॉर्डिंग की व्यवस्था हो जिसकी निगरानी केन्द्रीकृत कंट्रोल रूम द्वारा की जानी चाहिए और परीक्षा का परिणाम प्रत्येक राज्य में स्थित कंट्रोल रूम से ही आना चाहिए। इससे दलालों का बोलबाला काम हो जायेगा। इसके साथ ही सभी ड्राइविंग लाइसेंस को आधार से लिंक करना चाहिए ताकि कोई भी व्यक्ति एक से अधिक लाइसेंस न बनवा सके। नशेड़ी वाहन चालकों के विरुद्ध सख्त कार्यवाही की जाये, लाइसेंस निरस्त करके हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज किया जाये। ट्रैफिक पुलिस पर नकेल कसना एक मिनट का काम है अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो। ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों को निलंबित न करके उनकी सेवा समाप्त कर दी जानी चाहिए, चाहे वो ट्रैफिक पुलिस हो या फिर परिवहन विभाग। क्योंकि जब यह अधिकारी अपना काम ईमानदारी से नहीं करते हैं इसका सीधा मतलब है कि इन्होंने किसी कातिल को सड़क पर खुला छोड़ दिया है और सड़क दुर्घटना में इन अधिकारियों की अपरोक्ष जिम्मेदारी बनती है। बेरोजगारी की समस्या में भी कुछ हद तक कमी आएगी। सड़क के किनारे किसी भी प्रकार के सरकारी एवं गैर-सरकारी विज्ञापनों को तुरंत प्रभाव से बंद किया जाना चाहिए। विज्ञापनों कि लिए अख़बार, पत्रिकाएं, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, एवं अन्य भवनों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इसके कई फायदे होंगे, सरकारी आय बढ़ेगी, शहर साफ़ सुथरा  लगेगा और दुर्घटनाओं में कमी आएगी। वहां निर्माताओं पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है कि ऐसी व्यवस्था करें जिससे कि ड्राइवर कि ध्यान-भंग होने की गुंजाईश न्यूनतम हो जैसे की ड्राइवर को वीडियो देखने की व्यवस्था न हो, म्यूजिक कंट्रोल करने वाले बटन सुगम बनाये जाएँ, सभी वाहनों में इन-बिल्ट स्पीड गवर्नर का प्रावधान हो इत्यादि। इन सब के अतिरिक्त अधिक से अधिक अंडरपास, फुट-ओवर ब्रिज बनाये जाएँ, मुख्य सड़क पर आने से पहले सर्विस रोड का प्रावधान हो, रोड डिवाइडर में अवैध कट न हों, कट पाए जाएँ तो सम्बंधित अधिकारियों कि विरुद्ध आवश्यक कार्यवाही हों, उन पर गैर इरादतन हत्या का मुक़दमा चले। रोड पार करने के लिए केवल अधिकृत स्थानों का ही उपयोग संभव होना चाहिए, अन्य स्थानों पर डिवाइडर ब्लॉक रखने की समुचित व्यवस्था हों। इन सबके साथ ही सम्बंधित मंत्रालय/विभाग को सड़क के रख-रखाव एवं मरम्मत की उचित व्यवस्था करनी चाहिए, सड़कें खड्ढामुक्त होनी चाहिए। साथ ही पर्याप्त दृश्यता, सड़क के अक्षम डिज़ाइन और इंजीनियरिंग को भी जहाँ-जहाँ सुधार की आवश्यकता है, तत्काल किये जाने चाहिए।

जिन सुधारों के क्रियान्वयन में समय एवं धन के निवेश की आवश्यकता है उसे सम्बंधित मंत्रालय को प्राथमिकता पर रखना चाहिए और साथ ही ऐसे सुधार जिनमें केवल इच्छाशक्ति की आवश्यकता है को तुरंत प्रभाव से लागू करना चाहिए। इसके लिए यदि कानून में प्रावधान करने की या संशोधन करने की आवश्यकता हो तो भी तुरंत कड़े कदम उठाये जाने चाहिए। अन्यथा हम प्रत्येक वर्ष गंगटोक, फगवाड़ा या मोतिहारी जैसे शहरों के बराबर की आबादी खोते रहेंगे। एक व्यक्ति का इस दुनिया से यूँ चले जाना कितना दर्दनाक होता है इसका दर्द वही जान सकता है जिसने इस पीड़ा को किसी न किसी रूप में अनुभव किया हो। इसलिए इस क्षेत्र में तत्काल ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है अन्यथा यह मान लिया जाना चाहिए कि अन्य लोगों के साथ सरकार/मंत्रालय भी जनता को सुरक्षित न रख पाने के अपराध के सह-आरोपी हैं।

– आशीष पाठक की कलम से
(स्वतंत्र समीक्षक)

निष्पक्ष पत्रकारिता: क्या है हकीकत

हमारे देश में निष्पक्ष पत्रकारिता हमेशा से ही सवालों के घेरे में रही है। बड़े-बड़े न्यूज़ चैनल्स पर, अखबार प्रकाशकों पर और अब ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल्स पर हमेशा ही आरोप लगते रहे हैं पक्षपात के। क्या इन आरोपों में कोई सत्यता है? क्या पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता हकीकत है? क्या पेड न्यूज़ और झूठे नैरेटिव के आरोपों में कोई सच्चाई है? अगर इन सवालों के जवाब हाँ में है तो जरूरी हो जाता है कि सच्चाई की खोज की जाये और प्रकाशित भी की जाये।

आम जनता से बात की जाये तो आपको स्पष्ट हो जाता है कि कौन सा चैनल किस राजनीतिक दल को सपोर्ट करते हैं और कौन सा चैनल किस दल के विरोध करते है। यही कहानी अख़बारों के बारे में है और ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल्स के बारे में भी यही बातें कही जाती हैं। आप ऐसा होने के कारणों की विस्तृत जांच करें तो पता चलता है हकीकत क्या है। क्यों आम जनता इनके बारे में ऐसा सोचती है? क्यों आम जनता को लगता है कि उसे निष्पक्ष पत्रकारिता का अभाव है? इसका सीधा सा जवाब है स्वार्थ और लालच, मान-सम्मान का, अवार्ड्स का, पैसों का, निजी बदले लेने का, शोहरत पाने का। इस पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता के लिए जिम्मेदार हैं राजनैतिक दल, कॉर्पोरेट हाउसेस और उनके एजेंट्स। आचार्य चाणक्य ने कहा है लालच बुद्धि पर पर्दा डाल देता है और यह भी कहा है कि हर मित्रता के पीछे कोई ना कोई स्वार्थ जरूर होता है, ऐसी कोई मित्रता नहीं, जिसमें स्वार्थ ना हो और यह कड़वा सच है।

हमारे देश में रिश्वत का चलन काफी पुराना है, कोई नकद में विश्वास करता है कोई वस्तुओं के लेन-देन में। आमतौर पर देखा गया है कि ऐसी रिश्वतें देने के पीछे काफी बड़ा खेल होता है। रिश्वत दी जाती है सच्ची खबर छिपाने के लिए, झूठी खबर चलने के लिए, प्रतिद्वंदियों को नीचा दिखाने के लिए या फिर कोई नैरेटिव फ़ैलाने के लिए। आपने सुना होगा कि पत्रकारों को रेल किराए में छूट मिलती है, ऐसा अब तक सभी पूर्ववर्ती सरकारें करती आयी हैं। कोई भी सरकार ऐसी छूट वापस लेकर पत्रकारों के कोप-भाजन का शिकार नहीं होना चाहती। अभी हाल ही दिल्ली के मुख्यमंत्री ने मांग कर दी सभी पत्रकारों को टोल-टैक्स से छूट दी जानी चाहिए। किस पत्रकार को तनख्वाह नहीं मिलती या किस पत्रकार की आधिकारिक यात्रा का सारा खर्चा उसका ओफिस नहीं उठाता? यह एक प्रयास था पत्रकारों को लुभाने का। ऐसा नहीं है कि ऐसा पहली बार हुआ था, बल्कि इस से पहले भी ऐसे रसूखदार पत्रकारों को पद्म पुरुस्कारो से नवाज़ा जाता रहा है, राजनीतिक दल अपने प्रभाव का उपयोग कर कॉर्पोरेट कम्पनीज से विज्ञापन दिलवाकर अपने हक़ में पत्रकारिता करवाते रहे हैं।

कुछ पत्रकारों पर आरोप लगता है कि पूर्ववर्ती सरकारों में उनको पुरुस्कार, सम्मान राशि और अन्य लाभ पहुँचते रहे हैं और जब भी अवसर आता है उन पत्रकारों को नमक का हक़ अदा करना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ यही एक कारण हो पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता का, इसके अलग भी निजी वैर-भाव इसका एक कारण रहता है। किसी राजनेता ने किसी पत्रकार को ज्यादा देर इंतज़ार करवा दिया या फिर इंटरव्यू देने से मना कर दिया या फिर सवालों के पूछे जाने को लेकर कोई शर्त रख दी या फिर किसी सवाल के जवाब में पत्रकार की निष्पक्षता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया, किसी विशेष अवसर पर किसी विशेष पत्रकार की पत्रकारिता को गलत ठहरा दिया वगैरह वगैरह। मुझे एक प्रकरण याद आता है कि एक विशेष न्यूज़ चैनल के कुछ पत्रकार पक्षपाती रवैय्ये के लिए जाने जाते थे, एक घटना के दौरान चैनल पर सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने का आरोप लगाया और कार्यवाही कर दी। न्यूज़ चैनल को एक दिन के लिए ऑफ-एयर कर दिया गया, हश्र यह हुआ की चैनल और ज्यादा उग्रता के साथ पेश आने लगा और जहाँ कुछ पत्रकारों पर पक्षपाती होने का आरोप लगता था वहीँ पूरे न्यूज़ चैनल पर पक्षपाती होने का आरोप लगाने लगा। ऐसे ही अन्य प्रकरण में, एक पत्रकार ने एक बड़े कॉर्पोरेट घराने जो कि राजनीति में होने कि साथ साथ घोटाले में आरोपी भी थे कि साथ स्टिंग ऑपरेशन किया और कोशिश की कि वह लोग खबर को दबाने कि लिए रिश्वत देने को राज़ी हो जाएँ जिससे घोटाले की बात साबित हो जाये, लेकिन दांव उल्टा पड़ गया उनपर खुद एक स्टिंग ऑपरेशन हो गया और पैसे ऐंठने का आरोप लगा। अब पत्रकार और उनके साथी को सरकार कि प्रभाव में जेल हो गयी। परिणाम यह हुआ कि पूरे का पूरा न्यूज़ चैनल उस सरकार कि विरुद्ध खड़ा हो गया। ऐसा ही कुछ होता है जब राजनीतिक दल न्यूज़ चैनल्स, अख़बार प्रकाशकों और ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल्स की फंडिंग करने लगते हैं। इस फंडिंग का उद्देश्य या तो अपने पक्ष में मनमानी न्यूज़ चलवाने कि लिए होता है या फिर विरोधियों को घेरने कि लिए। दोनों हो सूरतों में पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता का बढ़ावा मिलता है क्योंकि गाहे-बेगाहे आपको अपने आकाओं की बात माननी ही पड़ेगी।

राजनीतिक दलों को भी पत्रकारिता के पेशे का सम्मान करना चाहिए। जिस प्रकार पत्रकारिता एक माध्यम है जनता तक राजनीतिक दलों की आवाज़ पहुँचाने का उसी प्रकार पत्रकारिता का धर्म कहता है की जनता के हित के सवाल राजनेताओं से पूछे जाएँ। जो कुछ भी राजनेता  आम जनता के लिए करते हैं उसके लिए तारीफ होनी चाहिए यद्यपि ऐसा करना उनकी जिम्मेदारी है। पत्रकार तो जनता की आवाज़ है और उसे आज़ादी है कि वह उन लंबित पड़े मुद्दों को उठाये जो कि राजनेताओं ने पूरे नहीं किये हैं। राजनीतिक दलों की मंशा पर या उनके क्रियाकलापों पर सवाल पूछना देशद्रोह नहीं बल्कि नैतिक जिम्मेदारी है। राजनेताओ को सवालों के जवाब देने चाहिए न कि भागना चाहिए।

राजनीतिक दलों में भी कुछ नेता ऐसे होते हैं जो पत्रकारों से सेटिंग रखते हैंऔर मनमानी न्यूज़ चलवाने का माद्दा रखते हैं। यही राजनेता उन तथाकथित पत्रकारों का उपयोग अपने दल की स्वार्थ सिद्धि के लिए करते हैं। और जब यह सब होने लगता हैं तो पत्रकारों के साथ-साथ न्यूज़ चैनल, अखबार प्रकाशक और ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल पर ठप्पा लग जाता हैं कि वो किस दल कि लिए पक्षपाती रवैय्या अपनाते हैं। ऐसे में मुश्किल में पड़ जाते हैं वो निष्पक्ष पत्रकार जिन्हें निष्पक्ष रहने के बावजूद कीमत अदा करनी पड़ती हैं पक्षपाती संस्थान में काम करने की। और यदि आपको लगता है कि ऐसा सिर्फ पत्रकारिता की दुनिया में हो रहा है तो आपका अंदाज़ा गलत है। यही कहानी दोहराई जाती है फिल्मकारों में, इतिहासकारों में, तथाकथित बुद्धिजीवियों में, लेखकों में और बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों में भी। यह स्वार्थ और लालच की नीति इस देश कि संस्कारों को दिन-प्रतिदिन खोखला कर रही है। राजनीतिक दलों को ही नहीं, बल्कि सभी उद्यमों के पेशेवरों को भी ऐसी परिस्थितियों से बचना चाहिए और आम जनता के विश्वास के साथ छल नहीं करना चाहिए।


– आशीष पाठक की कलम से
(स्वतंत्र समीक्षक)