निष्पक्ष पत्रकारिता: क्या है हकीकत

हमारे देश में निष्पक्ष पत्रकारिता हमेशा से ही सवालों के घेरे में रही है। बड़े-बड़े न्यूज़ चैनल्स पर, अखबार प्रकाशकों पर और अब ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल्स पर हमेशा ही आरोप लगते रहे हैं पक्षपात के। क्या इन आरोपों में कोई सत्यता है? क्या पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता हकीकत है? क्या पेड न्यूज़ और झूठे नैरेटिव के आरोपों में कोई सच्चाई है? अगर इन सवालों के जवाब हाँ में है तो जरूरी हो जाता है कि सच्चाई की खोज की जाये और प्रकाशित भी की जाये।

आम जनता से बात की जाये तो आपको स्पष्ट हो जाता है कि कौन सा चैनल किस राजनीतिक दल को सपोर्ट करते हैं और कौन सा चैनल किस दल के विरोध करते है। यही कहानी अख़बारों के बारे में है और ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल्स के बारे में भी यही बातें कही जाती हैं। आप ऐसा होने के कारणों की विस्तृत जांच करें तो पता चलता है हकीकत क्या है। क्यों आम जनता इनके बारे में ऐसा सोचती है? क्यों आम जनता को लगता है कि उसे निष्पक्ष पत्रकारिता का अभाव है? इसका सीधा सा जवाब है स्वार्थ और लालच, मान-सम्मान का, अवार्ड्स का, पैसों का, निजी बदले लेने का, शोहरत पाने का। इस पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता के लिए जिम्मेदार हैं राजनैतिक दल, कॉर्पोरेट हाउसेस और उनके एजेंट्स। आचार्य चाणक्य ने कहा है लालच बुद्धि पर पर्दा डाल देता है और यह भी कहा है कि हर मित्रता के पीछे कोई ना कोई स्वार्थ जरूर होता है, ऐसी कोई मित्रता नहीं, जिसमें स्वार्थ ना हो और यह कड़वा सच है।

हमारे देश में रिश्वत का चलन काफी पुराना है, कोई नकद में विश्वास करता है कोई वस्तुओं के लेन-देन में। आमतौर पर देखा गया है कि ऐसी रिश्वतें देने के पीछे काफी बड़ा खेल होता है। रिश्वत दी जाती है सच्ची खबर छिपाने के लिए, झूठी खबर चलने के लिए, प्रतिद्वंदियों को नीचा दिखाने के लिए या फिर कोई नैरेटिव फ़ैलाने के लिए। आपने सुना होगा कि पत्रकारों को रेल किराए में छूट मिलती है, ऐसा अब तक सभी पूर्ववर्ती सरकारें करती आयी हैं। कोई भी सरकार ऐसी छूट वापस लेकर पत्रकारों के कोप-भाजन का शिकार नहीं होना चाहती। अभी हाल ही दिल्ली के मुख्यमंत्री ने मांग कर दी सभी पत्रकारों को टोल-टैक्स से छूट दी जानी चाहिए। किस पत्रकार को तनख्वाह नहीं मिलती या किस पत्रकार की आधिकारिक यात्रा का सारा खर्चा उसका ओफिस नहीं उठाता? यह एक प्रयास था पत्रकारों को लुभाने का। ऐसा नहीं है कि ऐसा पहली बार हुआ था, बल्कि इस से पहले भी ऐसे रसूखदार पत्रकारों को पद्म पुरुस्कारो से नवाज़ा जाता रहा है, राजनीतिक दल अपने प्रभाव का उपयोग कर कॉर्पोरेट कम्पनीज से विज्ञापन दिलवाकर अपने हक़ में पत्रकारिता करवाते रहे हैं।

कुछ पत्रकारों पर आरोप लगता है कि पूर्ववर्ती सरकारों में उनको पुरुस्कार, सम्मान राशि और अन्य लाभ पहुँचते रहे हैं और जब भी अवसर आता है उन पत्रकारों को नमक का हक़ अदा करना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ यही एक कारण हो पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता का, इसके अलग भी निजी वैर-भाव इसका एक कारण रहता है। किसी राजनेता ने किसी पत्रकार को ज्यादा देर इंतज़ार करवा दिया या फिर इंटरव्यू देने से मना कर दिया या फिर सवालों के पूछे जाने को लेकर कोई शर्त रख दी या फिर किसी सवाल के जवाब में पत्रकार की निष्पक्षता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया, किसी विशेष अवसर पर किसी विशेष पत्रकार की पत्रकारिता को गलत ठहरा दिया वगैरह वगैरह। मुझे एक प्रकरण याद आता है कि एक विशेष न्यूज़ चैनल के कुछ पत्रकार पक्षपाती रवैय्ये के लिए जाने जाते थे, एक घटना के दौरान चैनल पर सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने का आरोप लगाया और कार्यवाही कर दी। न्यूज़ चैनल को एक दिन के लिए ऑफ-एयर कर दिया गया, हश्र यह हुआ की चैनल और ज्यादा उग्रता के साथ पेश आने लगा और जहाँ कुछ पत्रकारों पर पक्षपाती होने का आरोप लगता था वहीँ पूरे न्यूज़ चैनल पर पक्षपाती होने का आरोप लगाने लगा। ऐसे ही अन्य प्रकरण में, एक पत्रकार ने एक बड़े कॉर्पोरेट घराने जो कि राजनीति में होने कि साथ साथ घोटाले में आरोपी भी थे कि साथ स्टिंग ऑपरेशन किया और कोशिश की कि वह लोग खबर को दबाने कि लिए रिश्वत देने को राज़ी हो जाएँ जिससे घोटाले की बात साबित हो जाये, लेकिन दांव उल्टा पड़ गया उनपर खुद एक स्टिंग ऑपरेशन हो गया और पैसे ऐंठने का आरोप लगा। अब पत्रकार और उनके साथी को सरकार कि प्रभाव में जेल हो गयी। परिणाम यह हुआ कि पूरे का पूरा न्यूज़ चैनल उस सरकार कि विरुद्ध खड़ा हो गया। ऐसा ही कुछ होता है जब राजनीतिक दल न्यूज़ चैनल्स, अख़बार प्रकाशकों और ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल्स की फंडिंग करने लगते हैं। इस फंडिंग का उद्देश्य या तो अपने पक्ष में मनमानी न्यूज़ चलवाने कि लिए होता है या फिर विरोधियों को घेरने कि लिए। दोनों हो सूरतों में पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता का बढ़ावा मिलता है क्योंकि गाहे-बेगाहे आपको अपने आकाओं की बात माननी ही पड़ेगी।

राजनीतिक दलों को भी पत्रकारिता के पेशे का सम्मान करना चाहिए। जिस प्रकार पत्रकारिता एक माध्यम है जनता तक राजनीतिक दलों की आवाज़ पहुँचाने का उसी प्रकार पत्रकारिता का धर्म कहता है की जनता के हित के सवाल राजनेताओं से पूछे जाएँ। जो कुछ भी राजनेता  आम जनता के लिए करते हैं उसके लिए तारीफ होनी चाहिए यद्यपि ऐसा करना उनकी जिम्मेदारी है। पत्रकार तो जनता की आवाज़ है और उसे आज़ादी है कि वह उन लंबित पड़े मुद्दों को उठाये जो कि राजनेताओं ने पूरे नहीं किये हैं। राजनीतिक दलों की मंशा पर या उनके क्रियाकलापों पर सवाल पूछना देशद्रोह नहीं बल्कि नैतिक जिम्मेदारी है। राजनेताओ को सवालों के जवाब देने चाहिए न कि भागना चाहिए।

राजनीतिक दलों में भी कुछ नेता ऐसे होते हैं जो पत्रकारों से सेटिंग रखते हैंऔर मनमानी न्यूज़ चलवाने का माद्दा रखते हैं। यही राजनेता उन तथाकथित पत्रकारों का उपयोग अपने दल की स्वार्थ सिद्धि के लिए करते हैं। और जब यह सब होने लगता हैं तो पत्रकारों के साथ-साथ न्यूज़ चैनल, अखबार प्रकाशक और ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल पर ठप्पा लग जाता हैं कि वो किस दल कि लिए पक्षपाती रवैय्या अपनाते हैं। ऐसे में मुश्किल में पड़ जाते हैं वो निष्पक्ष पत्रकार जिन्हें निष्पक्ष रहने के बावजूद कीमत अदा करनी पड़ती हैं पक्षपाती संस्थान में काम करने की। और यदि आपको लगता है कि ऐसा सिर्फ पत्रकारिता की दुनिया में हो रहा है तो आपका अंदाज़ा गलत है। यही कहानी दोहराई जाती है फिल्मकारों में, इतिहासकारों में, तथाकथित बुद्धिजीवियों में, लेखकों में और बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों में भी। यह स्वार्थ और लालच की नीति इस देश कि संस्कारों को दिन-प्रतिदिन खोखला कर रही है। राजनीतिक दलों को ही नहीं, बल्कि सभी उद्यमों के पेशेवरों को भी ऐसी परिस्थितियों से बचना चाहिए और आम जनता के विश्वास के साथ छल नहीं करना चाहिए।


– आशीष पाठक की कलम से
(स्वतंत्र समीक्षक)

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